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राम -जानकी' विवाह में इंद्रलोक से आए देव; सनातन धर्म के दो महाग्रंथ 'रामायण' और भगवत गीता का अनुसरण कर जीवन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है ; वेदांती महाराज

ग्राम कछउआ में श्रीकुंअर महाराज मंदिर पर चल रही रामकथा में बुधवार को जगतगुरु डॉ वेदांती महाराज ने राम- सीता विवाह प्रसंग का सुंदर स्वरूप में वर्णन किया

ग्वालियर। महाग्रंथ रामायण संसार में रहकर सदाचार और अनुशासन से जीने की कला सिखाती है, तो भगवत गीता परिवार समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का बोध कराती है। रामायण और महाभारत का अनुसरण कर जीवन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। यह व्याख्या जगतगुरु डॉ राम कमल  वेदांती महाराज ने कछउआ में कुंवर महाराज मंदिर में चल रही राम कथा में आज बुधवार को की । 

राम कथा को आगे बढ़ाते हुए वेदांती महाराज ने माता जानकी की विदा का प्रसंग बताते हुए कहा कि बहू का शाब्दिक अर्थ एक नए कुल गोत्र की मान्यताओं को शिरोधार करे। उसे बहू कहते है। सुकृति बहू वह होती है जो प्रेम सेवा, सदाचार से परिवार को एक सूत्र में बांधे रखें और विपरीत समय में पति और परिवार के साथ खड़ी रहे । 

सीता-राम का विवाह देखने इंद्र पृथ्वी पर आए... 

भगवान राम और सीता का विवाह देखने के लिए इंद्र अपने इंद्रलोक के देवताओ के साथ पृथ्वी लोक पर आए। जब वह जनकपुरी में प्रवेश कर रहे थे तो समुची मिथिला  रोशनियों से जगमगा रही थी, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि राजा जनक का महल कौन सा है। जब वह एक घर में घुसे तो उन्होंने इस घर को राजा जनक का घर समझ लिया जब घर मालिक ने पूछा तो उन्होंने बताया कि मैं तो राजा दशरथ के दरबार का एक साधारण सदस्य हूं यह देखकर इंद्र हदप्रद् रह गए। 

सामाजिक एकरूपता का ध्यान रखते थे राजा-महाराजा

 सतयुग द्वापर और त्रेता में राजा महाराजा सामाजिक एकरूपता का बहुत ध्यान रखते थे।  राजा जनक के पास हीरे जवारत और स्वर्ण भंडार की कमी नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह सामान्य तौर तरीके से किया। समस्त मिथिला वासियों  को आमंत्रित किया गया था। 

वेदांती महाराज ने आधुनिक भोजन व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए बताया कि आज के युग में लोग पूरी और पापड़ वनाते है। पूरी को तोड़कर और पापड़ को फाड़कर खाते है। यानि वेवाहिक जीवन की शुरूआत ही तोड़-फोड़ से होती है। जवकि दाल -भात को मिलाकर खाना पड़ता है यानि कि मिलन। इसलिए हमारे यहां पहले कच्चे खाने का चलन था।  जनक की पुत्री के विवाह में दाल और भात परोसा गया था। 

  वेदों ने शक्ति आराधना के लिए नौ दिन … 

जगतगुरु वेदांती महाराज ने रामकथा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि वेद शास्त्रों ने भगवान राम-कृष्णा और शिव की आराधना के लिए एक-एक तिथि दी है, जो के सख्त याद रखने के लिए वर्ष में दो बार 9 दिन का समय दिया गया है। चैत्र नवरात्रि समाप्त होते ही भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव पड़ता है जबकि सर्दियां नवरात्र समाप्त होते ही दशहरा पर अहंकार रूपी रावण का अंत होता है। 

मां भगवती का आंचल पकड़ लो प्रभु स्वयं ही मिल जाएंगे: जगतगुरु 

इससे एक दिन पहले मंगलवार की कथा में वेदांती महाराज ने कछुआ में चल रही और राम कथा के पांचवें दिन श्रोताओं से कहा- प्रभु को पाने के लिए माता भगवती का आश्रय ले लेना प्रभु स्वयं ही आपके हृदय रूपी कमल में प्रकट हो जाएंगे। नई सृष्टि का आधार है सनातन संस्कृति ने हमेशा ही नारी को पूज्य माना गया है, जिस घर में नारी का मान सम्मान होता है वहां लक्ष्मी सरस्वती और कालिका वास रहता है और यहां त्रिदेवियां का वास होता है वहां नारायण स्वयं ही विराजमान रहते हैं यह बात जगतगुरु श्री रामकमल दास जी वेदांती महाराज ने कछुआ में चल रही और राम कथा के पांचवें दिन श्रोताओं से कही। 

सीता विवाह का वृतांत सुनाते हुए जगतगुरु  वेदांती महाराज ने बताया कि  सीता स्वयंवर में पृथ्वी लोक के एक से एक योद्धा राजा आए थे वही गुरु विश्वामित्र के साथ दो सुकोमल राजकुमार राम और लक्ष्मण पधारे थे । लाख कोशिशें के बाद भी कोई भी राजा धनुष को लेशमात्र नहीं हिला पाए। तब स्वयंवर में एक निराशा का भाव पैदा हो गया स्वयंवर में उपस्थित जनकपुर की प्रजा के मन में तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे। 

        तब सीता ने मां भगवती को किया याद... 

   गुरु की आज्ञा पाकर भगवान श्रीराम धनुष तोड़नेे के लिए धीरे-धीरे पद बढ़ा रहे थे,  तब माता सीता मन ही मन माता भवानी से अनुनय विनय कर रही थी कि है, मां  मैंने इस धनुष की बहुत सेवा की है धनुष में जड़ता की देवी का वास है अतः आप देवी को आप यहां उपस्थित राजाओं में विद्यमान कर दें जिससे इस धनुष का वजन त्रंन के समान हो जाए और प्रभु राम इसे तोड़ दें। 

श्रीराम ने मध्य से ही क्यों तोड़ा धनुष... 

जगतगुरु श्री राम कमल दास जी ने बताया की धनुष को मध्य से तोड़ने के पीछे पौराणिक मान्यता थी।  द्वापर त्रेता सतयुग तीनों काल में तीन राम  पैदा हुए थे,  पहले बलराम मध्य में राजाराम और  परशुराम  ने जन्म लिया । उन्होंने त्रिकाल की व्याख्या करते हुए बताया कि  दिवस में तीन कल होते हैं प्रातः दोपहर और  सायकाल, इस प्रकार मनुष्य के तीन अवस्थाएं होती हैं बालक, यौवन और वृद्धावस्था। वही व्यक्ति में तीन अवस्थाएं जागृत, सुषुप्त और स्वप्न।  राम का जन्म दिन के मध्यकाल दोपहर  12 बजे  हुआ था इसीलिए उन्होंने धनुष को मध्य से तोड़ा। 

भगवान परशुराम चार -कलाओं से युक्त थे.... 

 सीता विवाह समारोह में जैसे ही भगवान ने शिव धनुष को तोड़ा उसकी  टंकार  से तीनों लोक में पृथ्वी हिल गई।   इस अवसर पर शिव के अनन्य भक्त भगवान परशुराम जी का आगमन हुआ। 

वेदांती जी ने बताया कि परशुराम कोई साधन मनुष्य नहीं थे वह चार प्रकार की कलाओं से युक्त थे। परशुराम शास्त्र और शास्त्र के अद्भुत समुच्चय थे । परशुराम समस्त शास्त्रों के ज्ञाता थे, उनके मुखारविंद पर संपूर्ण शास्त्र विद्यमान रहते थे। 

आगे परशुराम लक्ष्मण संवाद के विषय में बताते हुए  वेदांती महाराज ने कहा कि अधिकांश लोग भगवान परशुराम और लक्ष्मण जी के संवाद  के मूल उद्देश्य नहीं जानते माता सीता के विवाह में पृथ्वी लोक के एक से एक योद्धा और राजा उपस्थित हुए थे।  भगवान परशुराम ने 17 बार भूमि को क्षत्रीय विहीन किया था उनके डर् से सभी राजा थर-थर कांपते थे। सीता विवाह में कोई विघ्न न आए इसलिए विवाह में सम्मिलित हुए । परशुराम जी ने प्रभु राम की ओर देखते हुए कहा कि जिस शिव धनुष को बड़े-बड़े योद्धा हिला नहीं पाए उसे अपने चुने बरसे तोड़ दिया है रमापति राघव आप मुझे क्षमा करें मैं जिसकी प्रतिक्षा कर रहा था वह अवतारी  आप ही हैं। जिस अस्ति से यह धनुष बना था ऐसा धनुष मेरे पास भी है। यदि उस धनुष की आप चाप चढ़ा देंगे तो मुझे विश्वास हो जाएगा कि आप पृथ्वी पर राक्षसों के संहार  के लिए आ चुके हैं। उन्होंने कहा कि संतों और सैनिकों के लिए राष्ट्र सर्वोपरि होता है, जहां संतों के लिए संस्कृति तो सैनिकों के लिए सरहद की रक्षा सर्वोपरि होती है । 

वेदांती महाराज ने कहा कि पुराणो के अनुसार  राजा दशरथ के चार पुत्र राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न असल में धर्म अर्थ काम मोक्ष के प्रतिबिंब थे वहीं राजा जनक व उनके छोटे भाई की चारों  पुत्रियां सीता मांडवी उर्मिला और  शतकीर्ती सेवा भक्ति उपासना और समर्पण का रूप थी। 

         विवाह में पांच रंग की साड़ी का विधान:- जगतगुरु  महाराज ने आधुनिक पहनावे को संस्कारहीन बताते हुए कहा कि महाभारत काल में रुक्मणी ने और रामायण काल में सीता जी ने पांच रंग की साड़ियों को पहना था। यह पांच रंग पृथ्वी जल आकाश तेज और वायु का प्रतीक है ।